दीर्घ प्रतीक्षा के बाद आखिरकार वह क्षण आ ही गया जब चमनलाल की अभीप्सा पूरी हुई और वे प्रथम बार पांडिचेरी आश्रम आ सके। किन्तु दुर्भाग्यवश वे राह में ही बीमार हो गये। जब वे यहाँ पहुंचे उनको तेज ज्वर था। वे अपने पुराने मित्र डॉक्टर इंद्रसेन के साथ आश्रम की क्रीड़ाभूमि पहुंचे। वहाँ पर श्रीमाँ लगभग १००० आश्रमवासियों को मूँगफली का प्रसाद वितरण कर रही थीं। प्रसाद-वितरण करते हुए जब श्रीमाँ उन दोनों के समीप आयी तब डॉक्टर इंद्रसेन ने माँ को बताया की चमनलाल प्रथम बार पांडिचेरी आये थे तथा वे बहुत बीमार थे और उन्हें अगले ही दिन लौटना था। श्रीमाँ ने कुछ नहीं कहा, किन्तु उन्होने चमनलाल को एक के स्थान पर दो पुड़ियाँ मूँगफली दीं। चमनलाल ने यह सोचकर दोनों पुड़ियाँ जेब में रख ली कि घर लौटकर उन्हें सबको प्रसाद के रूप में वितरित करेंगे।

अगले दिन पांडिचेरी से लौटने से पहले, आश्रम की प्रथानुसार चमनलाल श्रीमाँ को प्रणाम करने गये। डाक्टर इंद्रसेन की पुत्री सुश्री अस्तर ने श्रीमाँ को देने के लिये उन्हें कुछ फूल दिये। चमनलाल को यह सब एक निरर्थक प्रथा मात्र प्रतीत हुई क्योंकि उनका हृदय अभी भी श्रीमाँ के प्रति खुला नहीं था। वे न तो प्रणाम करना चाहते थे न फूल भेट करना। जब वे श्रीमाँ के सामने पहुंचे तब माँ ने स्वयं ही उनके हाथ से फूल लगभग खींच लिये और पूछा, “अब तुम ठीक हो?” उनके प्रश्न ने चमनलाल का हृदय छू लिया कि लगभग १००० व्यक्तियों में से श्रीमाँ को उनकी याद रही और यह भी याद रहा कि उन्हें बुखार था। अवश्य ही वे कोई साधारण व्यक्ति नहीं हो सकती! चमनलाल के हृदयकपाट उन्मुक्त हो गये और बाद में वे श्री माँ के समर्पित शिशु होकर आश्रमवासी हो गये।

(यह कथा चमनलाल  जी ने मुझे सुनाई थी। )

संदर्भ : श्रीअरविंद और श्रीमाँ की दिव्य लीला 

 

 

 

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