कई बार काम करते हुए मैं सोचा करता हूं कि आखिर इसका प्रयोजन क्या है? कृपया बतलाइये कि काम करते हुए मेरी क्या वृत्ति होनी चाहिये?
कर्म माताजी के लिए होना चाहिये और उन्हीं के अर्पण होना चाहिये। तुम्हें जो भी काम दिया जाये उसे तुम्हें माताजी का ही काम मानना चाहिये और उसे प्रसन्नता के साथ, अपने-आपको माताजी की शक्ति के प्रति खोल कर इस तरह करना चाहिये मानों उन्हीं की शक्ति तुम्हारे द्वारा कार्य कर रही हो।
तुम काम में तल्लीन हो सकते हो, लेकिन अपने-आपको इधर-उधर मत भागने दो-यानी तुम्हारे अन्दर मौन एकाग्रता हो।
संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र एक युवा साधक के नाम
एक या दो बार, बस खेल-ही-खेलमें आपने अपनी या श्रीअरविंदकी कोई पुस्तक ली और सहसा…
मेरे प्यारे बालक, तुम हमेशा मेरी भुजाओं में रहते हो और मैं तुम्हें सुख-सुविधा देने,…