यह लगभग तीन दशक पूर्व की बात है। मुझे रह-रहकर बहुत मानसिक पीड़ा होती थी कि  मुझे कभी श्रीअरविंद के दर्शन क्यों नहीं हुए। एक दिन अर्धरात्रि में मैं अपने इस दुर्भाग्य से व्यथित होकर रो पड़ी। मैंने अपने से कहा, “मैंने तो कभी श्रीअरविंद के कर कमलों से लिखित कोई वस्तु हाथ में भी नहीं ली।” रोते-रोते कुछ देर बाद मुझे नींद आ गयी। प्रातः उठने पर मैं  रात्रि की यह व्यथापूर्ण अनुभूति भूल गई।

उसी दिन मैं श्रीआँरोबिंदो आर्काइव्ज एण्ड रिसर्च पत्रिका ख़रीदने आश्रम के आर्काइव्ज विभाग गई। मैं पहले कभी इस कार्यालय में नहीं गई थी और महीनों से यह कार्य स्थगित करती आ रही थी। वहाँ मुझे बड़ी शिष्टता से सूचित किया गया कि यह पत्रिका तो आश्रम के मुख्य भवन में तथा ‘शब्द’ में भी मिलती है। विभाग में कोई बिक्री केंद्र नहीं था। मैं वहाँ के एक कार्यकर्ता पीटर हीस से बात करने लगी। मैंने पीटर को बताया कि मुझे श्रीअरविंद की ‘माता’ पुस्तक के एक वाक्य-खण्ड के बारे में कुछ शंका है। मैंने पूछा, “छपाई के समय कोई अल्प-विराम छूट तो नहीं गया? ‘ पीटर तुरंत मूल देखने को राज़ी हो गया। वह अंदर चला गया ।

मुझे आश्चर्य हुआ क्योंकि मुझे एक अस्पष्ट-सी धारणा थी कि श्रीअरविंद और श्रीमाँ द्वारा लिखित पांडुलिपियाँ आर्काइव्ज विभाग में सुरक्षित हैं । कुछ ही मिनटों में पीटर लौट आया और ‘माता’ पुस्तक की पांडुलिपि को यह कहते हुए, “तुम स्वयं देख सकती ही,’ मेरे हाथ में रख दिया। मेरे मन  में बिजली-सी कोंध गई। मुझे विगत रात्रि की याद आई  जब मुझे यह सोच कर तीव्र व्यथा हुई थी की श्रीअरविंद के दर्शन तो दूर मुझे उनके द्वारा लिखित कोई वस्तु छूने का सौभाग्य तक प्राप्त नहीं हुआ था। अंतर्यामी ने अविलंब मेरी अभिप्सा  पूर्ण कर दी। कृतज्ञता से मेरी आँखें भर आइ। मैंने उस पवित्र पांडुलिपि को माथे से लगा लिया। पुस्तक ठीक छपी थी। अल्पविराम विषयक मेरी शंका मेरी अभिप्सा को पूर्ण करने का साधन बन गई थी।

-श्यामकुमारी

संदर्भ : श्रीअरविंद और श्रीमाँ की दिव्य लीला 

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