पूर्णयोग की साधना

इस योग की साधना का कोई बँधा हुआ मानसिक अभ्यासक्रम या ध्यान का कोई निश्चित प्रकार अथवा कोई मंत्र या तंत्र नहीं है। बल्कि यह साधना साधक के ह्रदय की अभीप्सा से आरम्भ होती है ; साधक अपनी ऊर्ध्वस्थित या अंतःस्थित आत्मा का ध्यान करता है, अपने-आपको भागवत प्रभाव की ओर, ऊपर स्थित भागवत शक्ति और उसके कार्य की ओर तथा ह्रदय में विद्यमान भागवत उपस्थिति की ओर उद्घाटित कर देता है और जो कुछ इन बातों के लिए विजातीय है उस सबका परित्याग कर देता है। केवल श्रद्धा, अभीप्सा तथा आतमसमर्पण के द्वारा ही यह आत्मोद्घाटन हो सकता है।

संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र  

शेयर कीजिये

नए आलेख

सावधानी

अगर तुम जीवन में एक भूल करो तो हो सकता है कि तुम्हें सारे जीवन…

% दिन पहले

समुचित मार्ग

(अधिकतर साधक) अहंकारी होते हैं और वे अपने अहंभाव को अनुभव या स्वीकार नहीं करते।…

% दिन पहले

अवतार की सम्भावना

अवतार की सम्भावना पर विश्वास करने या न करने से प्रकट तथ्य पर कोई फ़र्क़…

% दिन पहले

ध्यान कहाँ ?

मधुर माँ,  यहाँ अपने कमरे में बैठ कर ध्यान करने और सबके साथ खेल के…

% दिन पहले

कुछ भी असंभव नहीं

यदि चैत्य पुरुष की प्रकृति जाग्रत हो जाए, अपने पीछे विद्यमान माताजी की चेतना और…

% दिन पहले

रूपान्तर की अवस्थाएँ

भागवत चेतना की विभिन्न अवस्थाएँ होती हैं। रूपांतर की भी विभिन्न अवस्थाएँ होती है। पहली…

% दिन पहले