यदि किसी को ध्यान का अभ्यास न हो तो आरम्भ में ही दीर्घकाल तक ध्यान लगाकार श्रांत होने की कोई आवश्यकता नहीं है ; क्योंकि थके-मांदे मन से जो ध्यान किया जाता है उसमें कोई शक्ति नहीं होती और न उससे कोई लाभ होता है। उस समय एकाग्र होकर ध्यान करने की अपेक्षा तन-मन को ढीला छोड़कर मनन किया जा सकता है। ध्यान जब सहज हो जाये तभी ध्यान करने का समय उत्तरोतर बढ़ाना चाहिये।
संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र (भाग -१)
तुम पानी में गिर पड़ते हो। वह विपुल जलराशि तुम्हें भयभीत नहीं करती। तुम हाथ-पांव…
अंदर की बेचैनी ही तुम्हें आंतरिक और बाह्य रूप से नींद लेने से रोकती है।…
तुम्हें डरना नहीं चाहिये। तुम्हारी अधिकतर कठिनाइयां भय से आती है। वास्तव में, ९० प्रतिशत…
श्रीअरविंद ने कितनी ही बार इस बात को दोहराया है कि परमात्मा हास्यप्रिय हैं और…