दो संभावनाएँ होती हैं, एक है व्यक्तिगत प्रयास के द्वारा शुद्धिकरण, जो लंबा समय लेता है; दूसरा है भागवत कृपा के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के द्वारा जो प्राय: तेजी से क्रिया करता है। भागवत कृपा के हस्तक्षेप द्वारा शुद्धिकरण के लिए व्यक्ति का सम्पूर्ण समर्पण और आत्मदान होना अनिवार्य है और उसके लिए, पुनः, सामान्य रूप से मन का पूर्णतः अचंचल होना आवश्यक है जिससे भागवत शक्ति को क्रिया करने में हर पग पर व्यक्ति की निष्ठा द्वारा समर्थन प्राप्त हो। अन्यथा, वह शांत और स्थिर बना रहे।
संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र (भाग-२)
उनके दुःख-दर्द से तीव्र रूप से पीड़ित होकर मैं तेरी ओर मुड़ी और उसका उपचार…
भागवत शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त करने तथा तुम्हारे माध्यम से बाह्य जीवन…
यह कभी न भूलो कि तुम अकेले नहीं हो । भगवान् तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारी…
जहाँ कहीं तुम एक महान अंत देखो, निश्चित हो जाओ कि एक महान आरंभ हो…
हमें यादों से इतना स्नेह होता है क्योंकि वे सार्वभौमिक हैं। उनके अन्दर 'अनन्तता' के…