नीरवता ! नीरवता !
यह ऊर्जाएँ एकत्र करने का समय है, व्यर्थ और निरर्थक शब्दों में उन्हें इधर-उधर बिखेरने का नहीं।
जो भी देश की वर्तमान स्थिति के बारें में अपनी राय की ज़ोर से घोषणा करता है उसे यह समझ लेना चाहिये कि उसकी रायों का कोई मूल्य नहीं है और उनसे भारत-माता को अपनी कठिनाइयों में से निकलने में जरा भी सहायता नहीं मिल सकती । अगर तुम उपयोगी होना चाहते हो तो पहले अपने-आप पर संयम करो और चुप रहो।
नीरवता, नीरवता, नीरवता ।
केवल नीरवता में ही कोई महान कार्य किया जा सकता है ।
संदर्भ : श्रीमातृवाणी (खण्ड-१७)
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