एकमात्र श्रीमाँ ही तुम्हारा लक्ष्य हैं। वे अपने अन्दर सब कुछ समाये हुये हैं। उनका पास होना अपने पास सब कुछ का होना है। अगर तुम उनकी ‘चेतना’ में रहो तो बाकी सभी गुण स्वतः ही खिल उठते हैं।
संदर्भ : श्रीअरविंद के ‘बांग्ला रचनाओ’ से
जीवनयात्रा में समस्त भय, संकट और विपदा का सामना करने के लिए कवच के रूप…
अपने तुच्छ, स्वार्थपूर्ण व्यक्तित्व से बाहर निकलो ओर अपनी भारतमाता के योग्य शिशु बनो ।…