हर दुर्भावनापूर्ण शब्द, हर मिथ्यापवाद चेतना की अधोगति है। और जब यह मिथ्यापवाद भद्दी भाषा और गंवारू शब्दों में प्रकट किया जाता है तो यह आत्मघात के समान होता है-अपनी अन्तरात्मा के आत्मघात के समान। जब अज्ञान में तुम औरों का बुरा बोलते हो तो तुम अपनी चेतना को भ्रष्ट और अन्तरात्मा को पदच्युत करते हो। जो ‘सत्य’ की सेवा करने के लिए जीता है उस पर बाह्य परिस्थितियों का कोई असर नहीं होता। जब तक कि तुम किसी के पक्ष में और किसी के विपक्ष में हो, तुम निश्चित रूप से ‘सत्य’ के बाहर हो।
संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)
उनके दुःख-दर्द से तीव्र रूप से पीड़ित होकर मैं तेरी ओर मुड़ी और उसका उपचार…
भागवत शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त करने तथा तुम्हारे माध्यम से बाह्य जीवन…
यह कभी न भूलो कि तुम अकेले नहीं हो । भगवान् तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारी…
जहाँ कहीं तुम एक महान अंत देखो, निश्चित हो जाओ कि एक महान आरंभ हो…
हमें यादों से इतना स्नेह होता है क्योंकि वे सार्वभौमिक हैं। उनके अन्दर 'अनन्तता' के…