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खेल-प्रतियोगिताएं और प्रगति

मां, क्या खेल-प्रतियोगिताएं हमारी प्रगति के लिये आवश्यक है?

नैतिक शिक्षाकी दृष्टिसे वे काफी हद तक आवश्यक है, क्योंकि यदि तुम उनमें सम्यक् वृत्तिके साथ भाग ले सको तो यह तुम्हारे लिये अपने अहंकारको वशमें करने का एक बहुत अच्छा अवसर है। पर यदि तुम उसमें भाग तो लो पर अपनी दुर्बलताओं और निम्न प्रवृत्तियों को जीतने का कोई प्रयत्न न करो तो स्पष्ट ही तुम उनसे लाभ उठाना नहीं जानते और तब कोई फायदा नहीं होता। किन्तु यदि तुम ठीक वृत्तिके साथ खेलने की भावना रखते हो और निम्न वृत्तियोंको, ईर्ष्या या महत्त्वाकांक्षा को नहीं आने देते और उस भावको जिसे “खिलाड़ी-जैसा सही भाव” कहते हैं, अर्थात् अपना पूरा प्रयत्न करते हुए परिणाम की चिन्ता न करना, इस भावको बनाये रखते हो, मतलब यह कि यदि तुम अधिकतम प्रयास करते हो और सफलता न मिलने पर या चीजें अपने पक्षमें न होने पर दुःखित नहीं होते तो प्रतियोगिता में भाग लेना बहुत उपयोगी है। इन सब प्रतियोगिताओं से तुम्हें महत्तर आत्म-नियंत्रण और परिणाम के प्रति अनासक्ति के भावकी प्राप्ति हो सकती है जिससे असाधारण चरित्र के गठनमें बड़ी सहायता मिलती है। अवश्य ही, यदि तुम इन चीजों को सामान्य ढंग से करो, सामान्य प्रति-क्रियाओं और ओछे व्यवहारको बीच में आने दो, तो तुम्हें कुछ भी सहायता नहीं मिलेगी। परन्तु यह बात तो, तुम चाहे जो भी करो, सभीके लिये ठीक है, खेल का क्षेत्र हो या बुद्धि का, जो भी हो, यदि व्यक्ति सामान्य ढंग से काम करता है तो वह अपना समय बर्बाद करता है। परन्तु यदि तुम खेलते वक्त, साम्मुख्यों और प्रतियोगिताओंमें भाग लेते वक्त सम्यक् वृत्ति बनाये रखते हो तो यह एक बहुत अच्छा शिक्षण है, क्योंकि यह तुम्हें विशेष प्रयत्नके लिये, अपनी सामान्य सीमाओं से थोड़ा आगे बढ़ने के लिये बाधित करता है। निश्चय ही यह एक सुयोग है जिसमें तुम अपनी बहुत सी प्रवृत्तियोंसे सचेतन हो सकते हो, अन्यथा वे सदा अचेतन ही बनी रहतीं।

परन्तु स्वभावतः, तुम्हें यह नहीं भूलना चाहिये कि इन्हें प्रगति में एक सुयोग और साधन बनाना है। यदि तुम, बस, अपने-आपको ऐसे ही शिथिल छोड़े रखते हो और बिलकुल सामान्य ढंग से खेलते हो तो तुम अपना समय बर्बाद करते हो; पर यह नियम तो प्रत्येक चीज के लिये हैः पढ़ाई के लिये तथा और सभी चीजों के लिये, वे चाहे जो भी हों। सब कुछ सदा ही इस पर निर्भर करता है प्किरश्न और उत्तर  काम को किस तरह किया जाता है, इस पर इतना नहीं कि व्यक्ति क्या करता है, बल्कि उस भावपर जिसमें वह उसे करता है।

सन्दर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५७-१९५८

 

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