जो भगवान का है उसे भला किसका डर हो सकता है ? क्या वह भगवान के बताये मार्ग पर – चाहे वह उसकी सीमित तर्क-बुद्धि के लिए एकदम से अबोध्य हो – विस्तृत होती हुई अंतरात्मा और प्रदीप्त मस्तक के साथ नहीं चल सकता ?

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)

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