“कितनी दूर मैं आ गया हूँ, और कितना रास्ता मुझे तय करना है?” – ऐसे प्रश्न बहुत उपयोगी नहीं होते। श्रीमाँ को कर्णधार बना कर प्रवाह के साथ बहो। वे तुम्हें तुम्हारें निर्धारित बन्दरगाह पर पहुंचा देगी ।
संदर्भ : श्रीअरविंद की बंगला रचनाएँ
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