अपनी सभी गतिविधियां में संकल्प के पूर्ण समर्पण के माध्यम से भागवत उपस्थिती तथा शक्ति के साथ अपनी आत्मा का एकत्व स्थापित करना कर्मयोग के पथिक की उच्च अभीप्सा होती है ।
संदर्भ : श्रीअरविंद (खण्ड-१२)
समता के बिना साधना में दृढ़ आधार नहीं बन सकता। परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी अप्रिय…
भारत को फिर से अपनी आत्मा को पाना और अभिव्यक्त करना होगा । संदर्भ : माताजी…
सोने से पहले, जब तुम सोने के लिए लेटो, तो भौतिक रूप से अपने-आपको शिथिल…
मधुर माँ, क्या नींद में अपने ऊपर पूरी तरह नियंत्रण पाना संभव है ? उदाहरण…
व्यापक दृष्टि से विचार करने पर मुझे ऐसा लगता है कि प्रचार करने योग्य सबसे…
तुम पानी में गिर पड़ते हो। वह विपुल जलराशि तुम्हें भयभीत नहीं करती। तुम हाथ-पांव…