आज से हम यह निश्चय कर लें कि हम अपने-आपको प्रतिदिन पूरी सच्चाई तथा सदिच्छा के साथ ऊपर उठायेंगे; एक तीव्र अभीप्सा के साथ उस सत्य
के सूर्य की ओर, उस चरम प्रकाश की ओर बढ़ेंगे जो विश्व का बौद्धिक जीवन तथा उसका स्रोत है, ताकि वह प्रकाश हमारे अन्दर पूर्ण रूप से
प्रवेश पाकर अपनी महान् ज्योति से हमारे मनों, हृदयों, सभी विचारों और कर्मों को प्रबुद्ध कर दे।
तभी हमें प्राचीन काल के उन महान् गुरु के निर्देश का अनुसरण करने का अधिकार तथा गौरव प्राप्त होगा जिनका कथन है: “करुणा से उमड़ते हुए हृदय के साथ इस संसार में प्रवेश करो जो कष्ट से भरपूर है। शिक्षक बनो और जहाँ-जहाँ अन्धकार तथा अज्ञान का साम्राज्य है वहाँ-वहाँ ज्ञान का दीपक जला दो।”
संदर्भ : पहले की बातें
तुम पानी में गिर पड़ते हो। वह विपुल जलराशि तुम्हें भयभीत नहीं करती। तुम हाथ-पांव…
अंदर की बेचैनी ही तुम्हें आंतरिक और बाह्य रूप से नींद लेने से रोकती है।…
तुम्हें डरना नहीं चाहिये। तुम्हारी अधिकतर कठिनाइयां भय से आती है। वास्तव में, ९० प्रतिशत…
श्रीअरविंद ने कितनी ही बार इस बात को दोहराया है कि परमात्मा हास्यप्रिय हैं और…