मैं हमेशा ऊपर की ओर देखती हूँ । ‘सौन्दर्य’, ‘शांति’ ,’प्रकाश’ वहाँ मौजूद हैं, वे नीचे आने के लिए तैयार हैं। अतः हमेशा अभीप्सा करो और उन्हें इस धरती पर अभिव्यक्त करने के लिए ऊपर देखो।
दुनिया की कुरूप चीजों की ओर नीचे न देखो। तुम जब कभी दु:खी होओ, तो हमेशा मेरे साथ ऊपर देखो।
संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-१)
तुम पानी में गिर पड़ते हो। वह विपुल जलराशि तुम्हें भयभीत नहीं करती। तुम हाथ-पांव…
अंदर की बेचैनी ही तुम्हें आंतरिक और बाह्य रूप से नींद लेने से रोकती है।…
तुम्हें डरना नहीं चाहिये। तुम्हारी अधिकतर कठिनाइयां भय से आती है। वास्तव में, ९० प्रतिशत…
श्रीअरविंद ने कितनी ही बार इस बात को दोहराया है कि परमात्मा हास्यप्रिय हैं और…