यदि अपनी कामनाओं के पीछे-पीछे चलना ही एकमात्र करने-योग्य कार्य होता तो निश्चय ही यह बड़ा आसान होता; परंतु अपनी कामनाओं द्वारा शासित होने को योग नहीं कहते।
आवश्यकता और चाह एक ही चीज़ नहीं है। वे लोग जो चाह या आकांक्षा के बिना इतने दिनों तक काम चला सकें, यही तथ्य सूचित करता है कि वह आकांक्षा उनकी आवश्यकता नहीं थी ।
संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र
हे माँ , मैं आपकी उपस्थिति का अनुभव क्यों नहीं करता ? मानसिक गतिविधि की…
कोई संस्था प्रगतिशील हुए बिना जीवित नहीं रह सकती। सच्ची प्रगति है हमेशा भगवान् के…