…. आध्यात्मिक जीवन जीने का अर्थ है अपने अन्दर दूसरे जगत के प्रति खुलना। यह मानों अपनी चेतना को उलटना है। साधारण मानव-
चेतना, यहां तक कि अतिविकसित मनुष्यों की, यहां तक कि मेधावी और महान् सिद्धि प्राप्त मनुष्यों की चेतना भी एक बहिर्मुखी गति होती है-
सारी शक्तियां बाहर की ओर प्रेरित होती हैं, सारी चेतना बाहर फैली होती है; और यदि कोई चीज अन्तर्मुखी होती भी है तो वह बहुत कम होती है,
बहुत विरल, बहुत आंशिक होती है, यह किन्हीं विशेष परिस्थितियों एवं उग्र आघातों के दबाव से होता है। ये आघात जीवन सिर्फ इसी आशय से
देता है कि चेतना की बहिर्मुखीनता की गति को थोड़ा उलट सके।
… जिन्होंने आध्यात्मिक जीवन बिताया है उन सबको एक ही अनुभव हुआ है : कहा जा सकता है कि सहसा उनकी सत्ता में कोई चीज उलट गयी, एकदम अचानक पलट गयी, कभी-कभी पूरी अन्दर की ओर मुड़ गयी, और अन्दर मुड़ने के साथ-साथ ऊपर की ओर भी मुड़ गयी, अन्दर से ऊपर की ओर–लेकिन यह बाहरी “ऊपर” नहीं है, यह है अन्दर गहराई में, भौतिक ऊंचाइयों की कल्पना से भिन्न कोई चीज। शब्दशः कोई चीज उलट गयी।..
जब सत्ता उलट जाती है तो यह सब समाप्त हो जाता है। तब मनुष्य खोजता नहीं, देखता है। अनुमान नहीं करता, जानता है। टटोलता नहीं, लक्ष्य की ओर सीधा चलता है। और जब वह आगे-थोड़ा हो आगे बढ़ चुकता है तब वह इस परम सत्य को जान जाता है, अनुभव करता है और इसे जीता है कि केवल ‘परम सत्य’ ही कार्य करता है, केवल ‘परम प्रभु’ ही कामना करते हैं, जानते हैं और मनुष्यों द्वारा काम करते हैं। वहां किसी गलती की गुंजायश ही कैसे रह सकती है? ‘वे’ जो कुछ करते हैं इसलिए करते हैं कि वे उसे करना चाहते हैं।
हमारी भ्रान्त दृष्टि के लिए ये शायद अबोध्य क्रियाएं होती हैं, लेकिन उनका कोई अर्थ होता है, उद्देश्य होता है और वे वहीं ले जाती हैं जहां
उन्हें ले जाना चाहिये।
संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५७-१९५८
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