तुम यह भूल जाते हो कि मनुष्य अपने स्वभाव में विभिन्न होते हैं और इसलिये प्रत्येक व्यक्ति अपने निजी तरीके से साधना में आयेगा — एक कर्म के द्वारा, एक भक्ति- के द्वारा, एक ध्यान और ज्ञान के द्वारा – और जो लोग ऐसा करने में समर्थ हैं वे एक साथ इन सबके द्वारा। अपने निजी पथ का अनुसरण करना तुम्हारे लिये एकदम उचित है, चाहे दूसरों का सिद्धांत जो कुछ भी क्यों न हो – पर दूसरों को भी अपने पथ का अनुसरण करने दो । अन्त में सब लोग एक साथ एक ही लक्ष्य पर मिल सकते हैं ।
संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र (भाग – २)
भगवान के प्रति पूर्ण आत्म-दान के लिए तीन विशेष विधियाँ : (१) सारे गर्व को…
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हे माँ , मैं आपकी उपस्थिति का अनुभव क्यों नहीं करता ? मानसिक गतिविधि की…