तुम यह भूल जाते हो कि मनुष्य अपने स्वभाव में विभिन्न होते हैं और इसलिये प्रत्येक व्यक्ति अपने निजी तरीके से साधना में आयेगा — एक कर्म के द्वारा, एक भक्ति- के द्वारा, एक ध्यान और ज्ञान के द्वारा – और जो लोग ऐसा करने में समर्थ हैं वे एक साथ इन सबके द्वारा। अपने निजी पथ का अनुसरण करना तुम्हारे लिये एकदम उचित है, चाहे दूसरों का सिद्धांत जो कुछ भी क्यों न हो – पर दूसरों को भी अपने पथ का अनुसरण करने दो । अन्त में सब लोग एक साथ एक ही लक्ष्य पर मिल सकते हैं ।
संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र (भाग – २)
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मैं तुम्हें अपना पुराना मन्त्र बताती हूं; यह बाह्य सत्ता को बहुत शान्त रखता है…
अगर अपात्रता का भाव तुम्हें उमड़ती हुई कृतज्ञता से भर देता है और आनन्दातिरेक के…