प्राण एक अच्छा यंत्र है पर बुरा मालिक है। यदि तुम इसे इसकी रुचि और अरुचि, इसकी मौजों, इसकी कामनाओं, इसके बुरे अभ्यासों का अनुसरण करने दो तो यह तुम्हारा मालिक बन जायेगा और सुख -शांति प्राप्त करना फिर संभव न रहेगा। उस समय यह तुम्हारा यंत्र नहीं बनता और न भागवत शक्ति का यंत्र बनता है, बल्कि अज्ञान की किसी शक्ति का अथवा किसी विरोधी शक्ति का भी यंत्र बन जाता है जो इसे पकड़ सकती और इसका उपयोग कर सकती है ।
संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र
उनके दुःख-दर्द से तीव्र रूप से पीड़ित होकर मैं तेरी ओर मुड़ी और उसका उपचार…
भागवत शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त करने तथा तुम्हारे माध्यम से बाह्य जीवन…
यह कभी न भूलो कि तुम अकेले नहीं हो । भगवान् तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारी…
जहाँ कहीं तुम एक महान अंत देखो, निश्चित हो जाओ कि एक महान आरंभ हो…
हमें यादों से इतना स्नेह होता है क्योंकि वे सार्वभौमिक हैं। उनके अन्दर 'अनन्तता' के…