सच्ची आध्यात्मिकता जीवन से संन्यास नहीं है, बल्कि ‘दिव्य पूर्णता’ के साथ जीवन को पूर्ण बनाना हैं ।
सन्दर्भ : माताजी के वचन ( भाग – १ )
एक या दो बार, बस खेल-ही-खेलमें आपने अपनी या श्रीअरविंदकी कोई पुस्तक ली और सहसा…
मेरे प्यारे बालक, तुम हमेशा मेरी भुजाओं में रहते हो और मैं तुम्हें सुख-सुविधा देने,…