साक्षी चेतना का मनोभाव

… यदि वे (मानसिक तथा प्राणिक) सत्ताएँ सदा सक्रिय रहती हैं और तुम सदा उनकी गतिविधियों के साथ तदात्म रहते हो तब पर्दा सदा बना रहेगा। यह भी संभव है कि तुम अपने को अलग कर लो और इन गतिविधियों को ऐसे देखो मानों वे तुम्हारी अपनी नहीं हैं बल्कि प्रकृति की एक यांत्रिक क्रिया हैं जिसका तुम एक तटस्थ साक्षी के समान अवलोकन करते हो। तब हम एक ऐसी आंतरिक सत्ता के प्रति अवगत हो जाते हैं जो अलग है, शांत है और प्रकृति में सम्मिलित नहीं है । यह आंतरिक मनोमय या प्राणमय पुरुष हो सकता है पर चैत्य नहीं, किन्तु आंतरिक मनोमय तथा प्राणमय पुरुष की चेतना की उपलब्धि चैत्य पुरुष के उदघाटन की ओर सदा ही एक पग उठाने जैसा होता है ।

संदर्भ : योग समन्वय

शेयर कीजिये

नए आलेख

उपस्थिति का अनुभव

हे माँ , मैं आपकी उपस्थिति का अनुभव क्यों नहीं करता ? मानसिक गतिविधि की…

% दिन पहले

ध्यान कहाँ?

मधुर माँ , यहाँ  अपने कमरे में बैठ कर ध्यान करने और सबके साथ खेल…

% दिन पहले

प्रगतिशील बनों

कोई संस्था प्रगतिशील हुए बिना जीवित नहीं रह सकती। सच्ची प्रगति है हमेशा भगवान् के…

% दिन पहले

केवल एक सहारा

भगवान के सिवा कभी किसी दूसरे मनुष्य या दूसरी वस्तु पर, वह चाहे जो हो…

% दिन पहले

श्रीमाँ के बालक

तुम माँ के बच्चे हो और माँ का अपने बच्चों के प्रति प्रेम असीम होता…

% दिन पहले

कामनाएँ

यदि अच्छी कामनाएँ हैं तो बुरी कामनाएँ भी आयेंगी। संकल्प और अभीप्सा तो साधना के…

% दिन पहले