हर एक के अपने विचार होते हैं और वह श्रीअरविन्द के लेखों में सें अपने विचारों का समर्थन करने वाले वाक्य खोज निकालता है । जो लोग इन विचारों का विरोध करते हैं वे भी उनके लेखों के अनुकूल वाक्य पा सकते हैं । पारस्परिक विरोध इसी तरह काम करता है । जब तक वस्तुओं के बारे में श्रीअरविन्द की समग्र दृष्टि को न लिया जाये तब तक सचमुच कुछ नहीं किया जा सकता ।
सन्दर्भ : माताजी के वचन (भाग – १)
एक या दो बार, बस खेल-ही-खेलमें आपने अपनी या श्रीअरविंदकी कोई पुस्तक ली और सहसा…
मेरे प्यारे बालक, तुम हमेशा मेरी भुजाओं में रहते हो और मैं तुम्हें सुख-सुविधा देने,…