हमारे लिए, पुनरुज्जीवन का अर्थ है, पुरानी चेतना का झड़ जाना; लेकिन यह केवल पुनर्जन्म नहीं है जो अतीत के साथ पूरी तरह सम्बन्ध तोड़ देता है।इसमें अपने पुराने स्व, अपनी निचली बाह्य प्रकृति की ओर से मरने और नये सूत्रपात में एक निरन्तरता रहती है। पुनरुज्जीवन के अनुभव में पुरानी सत्ता को छोड़ने की गति में और उभरती हुई नयी चेतना तथा नयी शक्ति की गति में नजदीक का सम्बन्ध होता है ताकि फेंकी हुई चीज में जो कुछ उत्तम है वह आने वाली नयी रचना के साथ मिल सके। पुनरुज्जीवन का सच्चा अर्थ यह है कि भागवत चेतना जिस अचेतना में उतर कर अपने-आपको खो बैठी है, वहां से, उस अचेतना से जागती है और मृत्यु, रात्रि और अन्धकार के लोक में उतरने के बावजूद अपने बारे में फिर से सचेतन होती है। वह अन्धकार का लोक हमारी भौतिक रात से ज्यादा अंधेरा होता है : अगर तुम उसमें गोता लगा कर आओ तो तुम्हें सचमुच अधिक-से-अधिक अभेद्य रात भी उजली लगेगी, ठीक वैसे ही जैसे दिव्य चेतना के सच्चे प्रकाश में से, बिना किसी धुंधलेपन के अतिमानसिक प्रकाश में से लौट कर भौतिक सूर्य काला लगता है। लेकिन उस परम अन्धकार की गहराइयों में ‘ज्योति’ छिपी रहती है। वह ‘ज्योति’, वह ‘चेतना’ तुम्हारे अन्दर जागे, तुम्हारे अन्दर महान् ‘पुनरुज्जीवन’ हो।
संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९२९-१९३१
उनके दुःख-दर्द से तीव्र रूप से पीड़ित होकर मैं तेरी ओर मुड़ी और उसका उपचार…
भागवत शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त करने तथा तुम्हारे माध्यम से बाह्य जीवन…
यह कभी न भूलो कि तुम अकेले नहीं हो । भगवान् तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारी…
जहाँ कहीं तुम एक महान अंत देखो, निश्चित हो जाओ कि एक महान आरंभ हो…
हमें यादों से इतना स्नेह होता है क्योंकि वे सार्वभौमिक हैं। उनके अन्दर 'अनन्तता' के…