जो भौतिक रूप से श्रीमाँ के पास नहीं हो सकते, वे उसके लिए अभीप्सा तो करें, लेकिन उसे पाने के लिए ज़मीन-आसमान एक करने की कोशिश न करें। अगर उन्हें बाहरी निकटता भी मिल जाये, वे देखेंगे कि आंतरिक एकात्मता तथा समीपता के बिना बाहरी सामीप्य का एकदम से कोई मूल्य नहीं हैं। तुम भौतिक रूप से माँ के क़रीब रहते हुए भी सहारा रेगिस्तान के जितने दूर हो सकते हो ।
संदर्भ : माताजी के विषय में
उनके दुःख-दर्द से तीव्र रूप से पीड़ित होकर मैं तेरी ओर मुड़ी और उसका उपचार…
भागवत शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त करने तथा तुम्हारे माध्यम से बाह्य जीवन…
यह कभी न भूलो कि तुम अकेले नहीं हो । भगवान् तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारी…
जहाँ कहीं तुम एक महान अंत देखो, निश्चित हो जाओ कि एक महान आरंभ हो…
हमें यादों से इतना स्नेह होता है क्योंकि वे सार्वभौमिक हैं। उनके अन्दर 'अनन्तता' के…