जो भौतिक रूप से श्रीमाँ के पास नहीं हो सकते, वे उसके लिए अभीप्सा तो करें, लेकिन उसे पाने के लिए ज़मीन-आसमान एक करने की कोशिश न करें। अगर उन्हें बाहरी निकटता भी मिल जाये, वे देखेंगे कि आंतरिक एकात्मता तथा समीपता के बिना बाहरी सामीप्य का एकदम से कोई मूल्य नहीं हैं। तुम भौतिक रूप से माँ के क़रीब रहते हुए भी सहारा रेगिस्तान के जितने दूर हो सकते हो ।
संदर्भ : माताजी के विषय में
हे माँ , मैं आपकी उपस्थिति का अनुभव क्यों नहीं करता ? मानसिक गतिविधि की…
कोई संस्था प्रगतिशील हुए बिना जीवित नहीं रह सकती। सच्ची प्रगति है हमेशा भगवान् के…