यदि अपनी भक्ति और समर्पण के पीछे तुम अपनी इच्छाओं को, अहंकार की अभिलाषाओं और प्राणों के हठों को छिपा रखोगे, अपनी सच्ची अभीप्सा के स्थान में इन चीजों को ला रखोगे या अपनी अभीप्सा में इन्हें मिला दोगे तो यह समझ लो की भग्वात्प्रसाद-शक्ति का इसलिये आवाहन करना कि वे तुम्हारा रूपांतर करें, बिल्कुल बेकार है ।
सन्दर्भ : माताजी के विषय में
हे माँ , मैं आपकी उपस्थिति का अनुभव क्यों नहीं करता ? मानसिक गतिविधि की…
कोई संस्था प्रगतिशील हुए बिना जीवित नहीं रह सकती। सच्ची प्रगति है हमेशा भगवान् के…