मेरा स्पर्श सदैव बना रहता है; बस तुम्हें उसे अनुभव करना सीखना होगा। न केवल किसी माध्यम द्वारा – जैसे कलम के स्पर्श से, यानि मुझे पत्र लिख कर – बल्कि उसे तुम्हें मन, हृदय, प्राण तथा शरीर पर प्रत्यक्ष क्रिया के रूप में अनुभव करना सीखना होगा। तब कठिनाइयाँ बहुत कम हो जायेंगी या कठिनाइयाँ एकदम विलीन हो जायेंगी।
संदर्भ : श्रीअरविंद अपने बारे में
उनके दुःख-दर्द से तीव्र रूप से पीड़ित होकर मैं तेरी ओर मुड़ी और उसका उपचार…
भागवत शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त करने तथा तुम्हारे माध्यम से बाह्य जीवन…
यह कभी न भूलो कि तुम अकेले नहीं हो । भगवान् तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारी…
जहाँ कहीं तुम एक महान अंत देखो, निश्चित हो जाओ कि एक महान आरंभ हो…
हमें यादों से इतना स्नेह होता है क्योंकि वे सार्वभौमिक हैं। उनके अन्दर 'अनन्तता' के…