मेरा स्पर्श सदैव बना रहता है; बस तुम्हें उसे अनुभव करना सीखना होगा। न केवल किसी माध्यम द्वारा –  जैसे कलम के स्पर्श से, यानि मुझे पत्र लिख कर – बल्कि उसे तुम्हें मन, हृदय, प्राण तथा शरीर पर प्रत्यक्ष क्रिया के रूप में अनुभव करना सीखना होगा। तब कठिनाइयाँ बहुत कम हो जायेंगी या कठिनाइयाँ एकदम विलीन हो जायेंगी।

संदर्भ : श्रीअरविंद अपने बारे में 

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