मरने से पहले, मिथ्यात्व अपनी पूरी पेंग में उठता है ।
अभी तक मनुष्य केवल विध्वंस के पाठ को ही समझता है। क्या मनुष्य के ‘सत्य’ की ओर आँखें खोलने से पहले उसे आना ही पड़ेगा ?
मैं सबसे प्रयास की मांग करती हूँ ताकि उसे न आना पड़े।
केवल ‘सत्य ‘ ही हमारी रक्षा कर सकता है, वाणी में सत्य, क्रिया में सत्य, संकल्प में सत्य, भावों में सत्य । यह ‘सत्य’ की सेवा करने या नष्ट हो जाने के बीच एक चुनाव है ।
संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-१)
उनके दुःख-दर्द से तीव्र रूप से पीड़ित होकर मैं तेरी ओर मुड़ी और उसका उपचार…
भागवत शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त करने तथा तुम्हारे माध्यम से बाह्य जीवन…
यह कभी न भूलो कि तुम अकेले नहीं हो । भगवान् तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारी…
जहाँ कहीं तुम एक महान अंत देखो, निश्चित हो जाओ कि एक महान आरंभ हो…
हमें यादों से इतना स्नेह होता है क्योंकि वे सार्वभौमिक हैं। उनके अन्दर 'अनन्तता' के…