मरने से पहले, मिथ्यात्व अपनी पूरी पेंग में उठता है ।
अभी तक मनुष्य केवल विध्वंस के पाठ को ही समझता है। क्या मनुष्य के ‘सत्य’ की ओर आँखें खोलने से पहले उसे आना ही पड़ेगा ?
मैं सबसे प्रयास की मांग करती हूँ ताकि उसे न आना पड़े।
केवल ‘सत्य ‘ ही हमारी रक्षा कर सकता है, वाणी में सत्य, क्रिया में सत्य, संकल्प में सत्य, भावों में सत्य । यह ‘सत्य’ की सेवा करने या नष्ट हो जाने के बीच एक चुनाव है ।
संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-१)
(अधिकतर साधक) अहंकारी होते हैं और वे अपने अहंभाव को अनुभव या स्वीकार नहीं करते।…
अवतार की सम्भावना पर विश्वास करने या न करने से प्रकट तथ्य पर कोई फ़र्क़…
यदि चैत्य पुरुष की प्रकृति जाग्रत हो जाए, अपने पीछे विद्यमान माताजी की चेतना और…
भागवत चेतना की विभिन्न अवस्थाएँ होती हैं। रूपांतर की भी विभिन्न अवस्थाएँ होती है। पहली…