महत्वपूर्ण सिद्धान्त

न केवल अपनी आन्तरिक एकाग्रता में बल्कि अपनी बाह्य क्रियाओं व गतिविधियों में भी तुम्हें उचित मनोवृत्ति अपनानी चाहिये। यदि तुम ऐसा करो और प्रत्येक चीज़ को श्रीमाँ के मार्गदर्शन में छोड़ दो तब तुम देखोगे कि कठिनाइयाँ कम होने लगी हैं, अधिक आसानी से समाप्त होने लगी हैं तथा चीज़ें धीरे-धीरे निर्विघ्न हो गयी हैं ।

अपने कर्म में तथा क्रियाओं में तुम्हें वही करना चाहिये जो तुम अपनी एकाग्रता में करते हो। श्रीमाँ के प्रति उद्घाटित रहो, कर्मो को उनके मार्गदर्शन में छोड़ दो, शांति, अवलम्ब देने वाली शक्ति, सुरक्षा का आवाहन करो और वे प्रभावकारी रूप से कार्य कर सकें इसके लिए सभी अनुचित प्रभावों को – जो संभावित रूप से अनुचित, असावधान या अचेतन गतिविधियों के रूप में बाधक बन कर आ सकते हैं – अस्वीकार करो।

इस सिद्धान्त का पालन करो और तुम्हारी समस्त सत्ता शांति तथा आश्रयदायिनी शक्ति और प्रकाश में, एक ही नियम के अधीन एकत्व प्राप्त कर लेगी ।

संदर्भ : माताजी के विषय में 

शेयर कीजिये

नए आलेख

प्रभो, वर दे!

उनके दुःख-दर्द से तीव्र रूप से पीड़ित होकर मैं तेरी ओर मुड़ी और उसका उपचार…

% दिन पहले

तीन शर्तें

भागवत शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त करने तथा तुम्हारे माध्यम से बाह्य जीवन…

% दिन पहले

भगवान तुम्हारे साथ हैं

यह कभी न भूलो कि तुम अकेले नहीं हो । भगवान् तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारी…

% दिन पहले

चिंता

चिंता करना जहर का प्याला पीने के समान है । संदर्भ : पथ पर 

% दिन पहले

महान अंत ? या महान आरंभ?

जहाँ कहीं तुम एक महान अंत देखो, निश्चित हो जाओ कि एक महान आरंभ हो…

% दिन पहले

यादें

हमें यादों से इतना स्नेह होता है क्योंकि वे सार्वभौमिक हैं। उनके अन्दर 'अनन्तता' के…

% दिन पहले