भागवत तत्त्व आवश्यक वस्तुओं को लिये चलता है

जब चैत्य शरीर से विदा लेता है, अपने विश्राम-स्थल की ओर जाते हए मन और प्राण की केंचुली को भी झाड़ता जाता है, उस समय, वह अपने अनुभवों का मर्म अपने साथ लेता जाता है-भौतिक घटनाएँ नहीं प्राणिक हलचलें नहीं, मानसिक रचनाएँ नहीं, क्षमताएँ या चरित्र भी नहीं, बल्कि इनसे सीखा हुआ कुछ सारभूत सत्य ले जाता है, कह सकते हैं कुछ भागवत अंश ले जाता है जिसके लिए बाक़ी सबका अस्तित्व था। वही स्थायी जमा-पूँजी है, वही भगवान् की ओर बढ़ने में सहायक है। यही कारण है कि साधारणतया पिछले जन्मों की बाहरी घटनाओं और परिस्थतियों की स्मृति शेष नहीं रहती। इस स्मृति के लिए मन, प्राण, यहाँ तक कि सूक्ष्म शरीर की भी अविच्छिन्न शृंखला बनाये रखने के लिए बहुत प्रबल विकास की ज़रूरत है; यद्यपि यह सब कुछ स्मृति में बीज-रूप में निहित रहता है, पर साधारणतया ऊपर उभर कर नहीं आता। योद्धा की उदारता में दिव्य तत्त्व का जो भी पुट था, जिसने उसकी निष्ठा, कुलीनता और शौर्य भरे साहस में अपने-आपको व्यक्त किया, कवि के सुसमञ्जस मानसिक चिन्तन और उदार जीवट के पीछे जो कुछ भगवान् का अंश था वही बच रहता है। जिसके द्वारा इसने अपने-आपको उजागर किया, और वही चरित्र के नये सुसंगठन में नया रूप पा सकता है या, यदि जीवन भगवन्मुखी हो तो उसे सिद्धि के लिए शक्तियों के रूप में लिया जा सकता है या फिर भगवान् के लिए काम करने में उसका उपयोग किया जा सकता है।


संदर्भ : श्रीअरविन्द के पत्र

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