हमारी प्रकृति भ्रांति तथा क्रिया की बेचैन अनिवार्यता के आधार पर कार्य करती है, भगवान अथाह निश्चलता में मुक्त रूप से कार्य करते हैं। यदि आत्मा पर इस निम्न प्रकृति की पकड़ को रद्द करना हैं तो हमें प्रशांति के उस अगाध तल में छलांग लगानी होगी और वही बन जाना होगा ।
संदर्भ : योग समन्वय
एक या दो बार, बस खेल-ही-खेलमें आपने अपनी या श्रीअरविंदकी कोई पुस्तक ली और सहसा…
मेरे प्यारे बालक, तुम हमेशा मेरी भुजाओं में रहते हो और मैं तुम्हें सुख-सुविधा देने,…