श्रीअरविंद के योग के साधक को भूतकाल और वर्तमान में पूजे जाने वाले भगवान के विभिन्न रूपों के पुजारियों के प्रति कैसी वृत्ति रखनी चाहिये ? अगर वह उनकी पूजा जारी रखे तो क्या वह उसकी प्रगति में बाधक होगी और उसके लक्ष्य की सिद्धि को रोकेगी ?
सभी पुजारियों की ओर शुभचिंतायुक्त सद्भावना।
सभी धर्मों के प्रति एक प्रबुद्ध उदासीनता।
रही बात ‘अधिमानस’ सत्ताओं के साथ संबंध की, अगर यह सम्बंध पहले से है तो हर एक का अपना अलग समाधान होगा।
संदर्भ : शिक्षा के ऊपर
जीवनयात्रा में समस्त भय, संकट और विपदा का सामना करने के लिए कवच के रूप…
अपने तुच्छ, स्वार्थपूर्ण व्यक्तित्व से बाहर निकलो ओर अपनी भारतमाता के योग्य शिशु बनो ।…
सारी समस्या का निचोड़ यह है : बुद्धि के मानसिक प्रशासन की जगह आध्यात्मिक चेतना…