श्रीअरविंद के योग के साधक को भूतकाल और वर्तमान में पूजे जाने वाले भगवान के विभिन्न रूपों के पुजारियों के प्रति कैसी वृत्ति रखनी चाहिये ? अगर वह उनकी पूजा जारी रखे तो क्या वह उसकी प्रगति में बाधक होगी और उसके लक्ष्य की सिद्धि को रोकेगी ?
सभी पुजारियों की ओर शुभचिंतायुक्त सद्भावना।
सभी धर्मों के प्रति एक प्रबुद्ध उदासीनता।
रही बात ‘अधिमानस’ सत्ताओं के साथ संबंध की, अगर यह सम्बंध पहले से है तो हर एक का अपना अलग समाधान होगा।
संदर्भ : शिक्षा के ऊपर
उनके दुःख-दर्द से तीव्र रूप से पीड़ित होकर मैं तेरी ओर मुड़ी और उसका उपचार…
भागवत शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त करने तथा तुम्हारे माध्यम से बाह्य जीवन…
यह कभी न भूलो कि तुम अकेले नहीं हो । भगवान् तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारी…
जहाँ कहीं तुम एक महान अंत देखो, निश्चित हो जाओ कि एक महान आरंभ हो…
हमें यादों से इतना स्नेह होता है क्योंकि वे सार्वभौमिक हैं। उनके अन्दर 'अनन्तता' के…