यह बिलकुल सच है कि “हमारे साधना-मार्ग में बलपूर्वक दबाने की यानी निग्रह की मनोवृत्ति नहीं है”; मानसिक विधान या सिद्धान्त के अनुसार असहमत प्राणिक सत्ता पर बल-प्रयोग नहीं होना चाहिये। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि प्राण अपनी सनक के मुताबिक जो मर्जी करे। बाध्य करना तरीका नहीं है, बल्कि आन्तरिक परिवर्तन होना चाहिये। इसके लिए उच्चतर चेतना को, जो प्राणिक कामना की वस्तुओं से अनासक्त है, निम्न प्राण को मार्गदर्शित, प्रबोधित तथा रूपान्तरित करना चाहिये। किन्तु इसको विकसित करने के लिए ऐसी मनोवृत्ति अपनानी चाहिये जिसमें निम्न प्राण के दावों की सन्तुष्टि को कम महत्त्व दिया जाये, कुछ सीमा तक नियन्त्रण, संयम हो जो इन चीजों के किसी भी कोलाहल से ऊपर रहना चाहिये, ऐसी चीजों को, जैसे भोजन को, उनके समुचित स्थान में सीमित कर देना चाहिये। निम्न प्राण का अपना स्थान है। इसे कुचलना या मार देना नहीं चाहिये, बल्कि इसे रूपान्तरित किया जाना चाहिये, “दोनों किनारों से इसे पकड़ना चाहिये”। ऊपरी किनारे पर अधिकार और नियन्त्रण तथा निचले किनारे पर उचित उपयोग होना चाहिये। मुख्य वस्तु है आसक्ति तथा कामना से छुटकारा पाना। तभी पूर्ण रूप से समुचित उपयोग सम्भव होता है।
संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र (भाग-२)
जीवनयात्रा में समस्त भय, संकट और विपदा का सामना करने के लिए कवच के रूप…
अपने तुच्छ, स्वार्थपूर्ण व्यक्तित्व से बाहर निकलो ओर अपनी भारतमाता के योग्य शिशु बनो ।…
सारी समस्या का निचोड़ यह है : बुद्धि के मानसिक प्रशासन की जगह आध्यात्मिक चेतना…