पृथ्वी के आरम्भकाल से जब भी और जहाँ भी व्यक्तिगत रूप से दैवी चेतन की अभिव्यक्ति की संभावना रही है, मैं वहाँ विद्यमान रही हूँ ।

संदर्भ : माताजी का अजेंडा (भाग – १)

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