पृथ्वी के आरम्भकाल से जब भी और जहाँ भी व्यक्तिगत रूप से दैवी चेतन की अभिव्यक्ति की संभावना रही है, मैं वहाँ विद्यमान रही हूँ ।
संदर्भ : माताजी का अजेंडा (भाग – १)
एक या दो बार, बस खेल-ही-खेलमें आपने अपनी या श्रीअरविंदकी कोई पुस्तक ली और सहसा…
मेरे प्यारे बालक, तुम हमेशा मेरी भुजाओं में रहते हो और मैं तुम्हें सुख-सुविधा देने,…