बिलकुल स्वाभाविक रूप से हम अपने-आपसे पूछते हैं कि वह कौनसा रहस्य है जहां पीड़ा हमें ले जाती है। एक उथली और अपूर्ण दृष्टि से देखने पर व्यक्ति यह विश्वास कर सकता है कि यह पीड़ा ही है जिसे अन्तरात्मा खोज रही है। पर बात ऐसी बिलकुल नहीं है। क्योंकि अन्तरात्मा का अपना निज स्वभाव है स्थिर, अपरिवर्नशील, निरपेक्ष और परमाहलादकारी दिव्य आनन्द। परन्तु यह सच है कि यदि व्यक्ति कष्ट का साहस, सहिष्णुता और भागवत कृपा में अडिग विश्वास के साथ सामना कर सके और जब कभी कष्ट आये तो उससे बचते फिरने के स्थान पर इस संकल्प और इस अभीप्सा के साथ उसे अंगीकार करे कि इसमें से पार होना और उस ज्योतिर्मय सत्य एवं अपरिवर्ती आनन्द को खोज निकालना है जो सभी वस्तुओं के अन्तस्तल में विद्यमान है तो पीड़ा-द्वार इच्छा-तुष्टि या तृप्ति की अपेक्षा अधिक सीधा और अधिक निकटस्थ द्वार होता है।
मैं ऐन्द्रिय सुख के बारे में नहीं कह रही हूं क्योंकि वह तो निरन्तर और लगभग पूरी तरह इस अगाध दिव्य आनन्द की ओर से पीठ फेरे रहता है। ऐन्द्रिय सुख धोखा देने वाला और विकृत छद्मरूप है जो हमें अपने लक्ष्य से भटका कर दूर ले जाता है और यदि हमारे अन्दर सत्य को पाने की आतुरता है तो निश्चय ही हमें इसकी खोज नहीं करनी चाहिये। यह सुख हमें सारहीन बना देता है, हमें ठगता और भटकाता है। पीड़ा हमें एकाग्रचित्त होने के लिए विवश कर देती है ताकि हम उस कुचलने वाली चीज को सहने और उसका सामना करने में समर्थ बन सकें। इस प्रकार वह हमें गंभीरतर सत्य की ओर वापस ले जाती है। यदि व्यक्ति सबल हो तो दुःख में ही सबसे आसानी से सच्ची शक्ति प्राप्त करता है। दुःख में पड़ कर ही फिर से सच्चे श्रद्धा-विश्वास को प्राप्त करना सबसे आसान होता है, -किसी ऐसी चीज में विश्वास जो परे है, ऊपर है, सब दुःखों से परे है।
जब व्यक्ति आमोद-प्रमोद में भूला रहता है, जब वह वस्तुओं को उसी रूप में लेता है जिस रूप में वे आती हैं और गम्भीर होकर जीवन पर सीधी दृष्टि डालने से बचना चाहता है, एक शब्द में, जब वह भूल जाना चाहता है, यह भूल जाना चाहता है कि कोई समस्या है जिसका समाधान करना है, कोई चीज है जिसे पाना है और यह कि हमारे अस्तित्व और जीवन का कुछ हेतु है, हम यहां केवल समय बिताने और बिना कुछ सीखे या किये, यहां से चले जाने के लिए नहीं आये हैं, तो सचमुच वह अपना समय बरबाद करता है। और एक ऐसे सुयोग को खो बैठता है-इस सुयोग को मैं अद्वितीय तो नहीं, पर अद्भुत कह सकती हूं-जो उसे एक ऐसे अस्तित्व के लिए मिला है जो प्रगति का स्थान है, जो अनन्तता में एक ऐसे क्षण के समान है जब तुम जीवन के रहस्य की खोज कर सकते हो। यह स्थूल-पार्थिव अस्तित्व एक अद्भुत सुयोग है, एक सम्भावना है जो तुम्हें जीवन के अस्तित्व-हेतु का पता लगाने, इस गंभीरतर सत्य की ओर एक पग आगे बढ़ने के लिए दी गयी है। इसलिए दी गयी है कि तुम्हें दिव्य जीवन के शाश्वत आनंदोल्लास के सम्पर्क में ला देता है ।
मैं तुमसे पहले भी बहुत बार कह चुकी हूं कि दुःख-कष्ट की चाह करना एक अस्वस्थ मनोवृत्ति है, इससे अवश्य बचना चाहिये, पर भुलक्कड़पन के द्वारा, उथली, हल्की क्रियाओं और मनोविनोद द्वारा, उनसे भागना कायरता है। जब कोई दुःख आता है तो हमें कुछ सिखाने के लिए आता है। जितनी जल्दी हम उसे सीख लेंगे उतनी ही जल्दी उसकी आवश्यकता कम हो जायेगी। और जब हम रहस्य को जान जाते हैं तब फिर दुःखी होना सम्भव नहीं रहता, क्योंकि वह रहस्य हमें दुःख का हेतु, प्रयोजन, भूल और उससे बाहर निकलने का रास्ता दिखा देता है। वह रहस्य है अहं से छुटकारा पा लेना, उसकी कैद से निकल आना, अपने-आपको भगवान के साथ एक कर लेना, उनमें मिला देना, किसी भी चीज को उनसे हमें अलग न करने देना। जब व्यक्ति एक बार इस रहस्य को खोज लेता है और इसे अपनी सत्ता में चरितार्थ कर लेता है तो पीड़ा के अस्तित्व का कोई हेतु नहीं रह जाता और दुःख गायब हो जाता है। यह सत्ता के गहरे भागों में, आत्मा में, आध्यात्मिक चेतना में ही नहीं बल्कि जीवन और शरीर में भी, दःख से छुटकारा पाने का प्रबलतम उपाय है।
सन्दर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५७-१९५८
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