मनुष्य-जीवन के अधिकांश भाग की कृत्रिमता ही उसकी अनेक बुद्धमूल व्याधियों का कारण है, वह न तो अपने प्रति सच्चा है और ना ही प्रकृति के प्रति। इसी कारण वह ठोकरें खाता हैं, कष्ट पाता है।

संदर्भ : मानव-एकता का आदर्श

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