जैन दर्शन और पूर्ण योग

जैन दर्शन का संबंध व्यक्तिगत पूर्णता से है। हमारा प्रयास बिल्कुल भिन्न है। हम एक नवीन शक्ति के रूप में अतिमानस को उतार लाना चाहते हैं । ठीक जिस तरह आजकल मनुष्यजाति के अंदर मन चेतना की स्थायी स्थिति है,उसी तरह हम एक ऐसी जाति की सृष्टि करना चाहते हैं जिसमें अतिमानस चेतना की स्थायी स्थिति होगी ।

संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र (भाग-१)

शेयर कीजिये

नए आलेख

उचित वृत्ति

कुछ ऐसे अति-धर्मशील लोग होते है जो अपने सामने समस्याएँ  तो खड़ी कर लेते हैं,…

% दिन पहले

श्रीअरविंद से मिलना

श्रीअरविन्द सूक्ष्म-भौतिक में निरन्तर रहते हैं और वहां बहुत सक्रिय हैं। मैं प्रायः रोज उनसे…

% दिन पहले

उपस्थिति का अनुभव

हे माँ , मैं आपकी उपस्थिति का अनुभव क्यों नहीं करता ? मानसिक गतिविधि की…

% दिन पहले

ध्यान कहाँ?

मधुर माँ , यहाँ  अपने कमरे में बैठ कर ध्यान करने और सबके साथ खेल…

% दिन पहले

प्रगतिशील बनों

कोई संस्था प्रगतिशील हुए बिना जीवित नहीं रह सकती। सच्ची प्रगति है हमेशा भगवान् के…

% दिन पहले

केवल एक सहारा

भगवान के सिवा कभी किसी दूसरे मनुष्य या दूसरी वस्तु पर, वह चाहे जो हो…

% दिन पहले