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छेदवाला सिक्का – श्रीमाँ की कहानी

पुराने जमाने में कुछ लोग सोचते थे कि एक कटे किनारों वाला सिक्का… वह ऐसा जमाना था जब सिक्कों में छेद नहीं किये जाते थे… अब तो कटे किनारे या छेदवाले सिक्के होते हैं, है न, कुछ देशों में छेदवाले सिक्के चलते हैं, लेकिन उस जमाने में उनमें छेद नहीं किये जाते थे, और फिर भी कभी-कभी किसी सिक्के में छेद होते थे। और तब सचमुच इस तरह का अन्धविश्वास था, कि जब भी किसी को छेदवाला सिक्का मिला तो वह सौभाग्य लाया। तुम जो करना चाहते थे उसमें तुम्हारे लिए वह सौभाग्य या सफलता लाया।

किसी दफ्तर में एक कर्मचारी था। वह काफी गरीब था और बहुत सफल नहीं था। एक दिन उसे छेदवाला सिक्का मिल गया। उसने उसे अपनी जेब में डाल लिया और अपने-आपसे कहा: “अब मैं समृद्ध हो जाऊंगा!” और वह आशा, साहस और ऊर्जा से भर गया, जानता था : “अब चूंकि मेरे पास सिक्का है, इसलिए मेरा सफल होना निश्चित है!” और, वास्तव में, वह समृद्ध होता गया, अधिकाधिक समृद्ध। वह अधिकाधिक पैसा कमाता जा रहा था, उसका पद ऊंचा होता जा रहा था और लोग कहते थे : “कितना योग्य मनुष्य है! कितनी अच्छी तरह काम करता है ! यह सभी समस्याओं को हल कर देता है !” सचमुच, वह विलक्षण बन गया था, और रोज सुबह कोट पहनते समय वह उसे छूता था-इस तरह-यह निश्चित करने के लिए कि उसका सिक्का जेब में है तो…। वह छूता था, वह महसूस करता था कि सिक्का है, और उसे विश्वास रहता था। और फिर, एक दिन, उसे जरा कुतूहल हुआ और उसने कहा: “मैं अपने सिक्के को देखूगा!”-बरसों बाद…। वह अपनी पत्नी के साथ बैठ कर नाश्ता कर रहा था, वह बोला : “मैं अपने सिक्के को  देखूंगा!”

उसकी पत्नी ने कहा : “तुम अपना सिक्का क्यों देखना चाहते हो? कोई जरूरत नहीं।”-

“हां, हां, मुझे अपना सिक्का देखने दो।” उसने वह थैला निकाला जिसमें सिक्का रखा था और देखता क्या है, उसमें सिक्का तो है पर उसमें छेद नहीं है!

उसने कहा : “ओह, यह मेरा सिक्का नहीं है ! यह क्या है? किसने मेरा सिक्का बदल दिया?” तब उसकी पत्नी ने कहा : “देखो, एक दिन तुम्हारे कोट पर धूल थी… मैंने उसे खिड़की के बाहर झाड़ा और सिक्का गिर गया। मैं भूल गयी थी कि उसमें सिक्का रखा था। मैं उसे ढूंढ़ने के लिए दौड़ी लेकिन वह मिला नहीं। किसी ने उसे उठा लिया था। तब मैंने सोचा कि तुम बहुत दुःखी होओगे और मैंने उसमें दूसरा सिक्का रख दिया।”

(हंसी) निस्सन्देह, उसे विश्वास था कि उसका सिक्का वहां है और इतना काफी था।

श्रद्धा ही, विश्वास ही है जो काम करता है, है न… छेदवाला सिक्का तुम्हें कुछ नहीं देता। तुम आजमा सकते हो। जब विश्वास हो…

तो!… अब बस।

सन्दर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५४

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