जो चीज़ योग करने का संकल्प करती है वह तुम्हारा शरीर या तुम्हारा प्राण, यहाँ तक कि तुम्हारा मन भी नहीं है, वह तुम्हारें मन का उच्चतर भाग या तुम्हारा चैत्य पुरुष होता है ।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर (१९५०-१९५१)

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