अंततः मुझे मिला इस मधुर और भीषण

जगत में आत्मा के जन्म का उद्देश्य,

मैंने अनुभव किया पृथ्वी का क्षुधित हृदय जो

अभीप्सा करता है स्वर्ग के परे कृष्ण के चरण ।

 

मैंने देखा है अमर नयनों का सौंदर्य,

मैंने सुना है प्रिय का मादक वंशी-नाद,

और जाना है मृत्युरहित आनंद का आश्चर्य

और अपने हृदय में दुख को, जो है सदा के लिए निर्वाक।

 

निकट और निकटतर अब संगीत आ रहा,

विलक्षण हर्षातिरेक से जीवन थरथरा रहा ;

सम्पूर्ण प्रकृति है एक विशाल विरमावस्था अनुरक्तिपूर्ण

निज प्रभु के स्पर्श, आर्लिंगन, तन्मयता की आकांक्षिण।

 

जीवित रहे विगत युग इस एक क्षण को लक्ष्य कर;

जगत धड़कता है कृतकृत्य मुझमें अब चिरकाल के अनन्तर।

संदर्भ : श्रीअरविंद की कविताओं से 

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