एक बार बीरेन के एक मित्र आश्रम आए। वे बीरेन के लिए बर्मा टीक की एक आराम कुर्सी बनवा कर लाए। बीरेन ने श्रीअरविंद से लिखकर पूछा कि क्या वे कुर्सी स्वीकार कर सकते थे। श्रीअरविंद ने उत्तर दिया, “तुम कुर्सी को स्वीकार कर सकते हो, मानों वह तुम्हें श्रीमाँ की ओर से मिली है। तुम्हारे मन में (मित्र के) अहसान की कोई भावना नहीं होनी चाहिए।”
संदर्भ : श्रीअरविंद और श्रीमाँ की दिव्य लीला
भगवान के प्रति पूर्ण आत्म-दान के लिए तीन विशेष विधियाँ : (१) सारे गर्व को…
श्रीअरविन्द सूक्ष्म-भौतिक में निरन्तर रहते हैं और वहां बहुत सक्रिय हैं। मैं प्रायः रोज उनसे…
हे माँ , मैं आपकी उपस्थिति का अनुभव क्यों नहीं करता ? मानसिक गतिविधि की…