उदाहरण सबसे अधिक प्रभावी प्रशिक्षक है। किसी बच्चे से ऐसे नियम-पालन के लिए कभी न कहो जिसका अनुसरण स्वयं तुम नहीं करते। स्थिर-शांति, समता, सुव्यवस्था, विधिबद्धता, व्यर्थ के शब्दों का अभाव- ये ऐसी चीज़ें हैं जिनका अध्यापक को हमेशा अभ्यास करते रहना चाहिये, यदि वह चाहता है कि उसके विद्यार्थियों में ये गुण पैदा हों।
अध्यापक को हमेशा समय-पालन करना चाहिये। उसे हमेशा, ठीक वेशभूषा के साथ कक्षा शुरू होने से कुछ मिनट पहले आ जाना चाहिये। और सबसे बढ़ कर, उसे कभी झूठ न बोलना चाहिये ताकि उसके विद्यार्थी झूठ न बोलें, उसे कभी विद्यार्थियों पर क्रोधित न होना चाहिये ताकि विद्यार्थी कभी क्रोध न करें, और यह कह सकने के लिए : “उपद्रव का अन्त प्रायः आँसुओं में होता है,” उसके कभी उनमें से किसी पर हाथ न उठाना चाहिये।
ये बिलकुल प्रारम्भिक और मौलिक बातें है जिनका अभ्यास बिना अपवाद के हर विद्यालय में होना चाहिये।
संदर्भ : शिक्षा के ऊपर
भगवान मुझसे क्या चाहते है ? वे चाहते है कि पहले तुम अपने-आपको पा लो,…
जीवनयात्रा में समस्त भय, संकट और विपदा का सामना करने के लिए कवच के रूप…
अपने तुच्छ, स्वार्थपूर्ण व्यक्तित्व से बाहर निकलो ओर अपनी भारतमाता के योग्य शिशु बनो ।…