शारीरिक भावना के साथ बंधे हुए मानसिक और प्राणिक अहं की रचना ही वैश्व प्राण का, अपने क्रमिक विकास में, सर्वप्रथम और महान् प्रयास था; क्योंकि जड़तत्त्व में से सचेतन व्यक्ति को उत्पन्न करने का जो साधन उसने ढूंढ निकाला वह यही था। इस सीमाकारी अहं का विलय कर
देना ही वह एकमात्र शर्त एवं आवश्यक साधन है जिसके द्वारा स्वयं यह वैश्व प्राण अपनी दिव्य परिणति प्राप्त कर सकता है। क्योंकि केवल इसी तरीके से सचेतन व्यक्ति अपने परात्पर आत्म-स्वरूप या सच्चे पुरुष को उपलब्ध कर सकता है।
संदर्भ : योग समन्वय
तुम पानी में गिर पड़ते हो। वह विपुल जलराशि तुम्हें भयभीत नहीं करती। तुम हाथ-पांव…
अंदर की बेचैनी ही तुम्हें आंतरिक और बाह्य रूप से नींद लेने से रोकती है।…
तुम्हें डरना नहीं चाहिये। तुम्हारी अधिकतर कठिनाइयां भय से आती है। वास्तव में, ९० प्रतिशत…
श्रीअरविंद ने कितनी ही बार इस बात को दोहराया है कि परमात्मा हास्यप्रिय हैं और…