साधारण रूप से, सामान्य मनुष्य में भौतिक, शारीरिक चेतना चीजों को वैसे नहीं देखती जैसी कि वे वस्तुतः है , यह तीन कारणों से है : अज्ञान के कारण, विशिष्ट अभिरुचि के कारण, और एक स्व-अहं पूर्ण संकल्प की वजह से। जो तुम देखते हो उसे रंग देते हो, जो बात तुम्हें अप्रसन्न करती है, तुम उसे मिटा देते हो, तुम वही देखते हो जो तुम देखना चाहते हो ।
संदर्भ : माताजी के एजेंडा (भाग-१)
उनके दुःख-दर्द से तीव्र रूप से पीड़ित होकर मैं तेरी ओर मुड़ी और उसका उपचार…
भागवत शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त करने तथा तुम्हारे माध्यम से बाह्य जीवन…
यह कभी न भूलो कि तुम अकेले नहीं हो । भगवान् तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारी…
जहाँ कहीं तुम एक महान अंत देखो, निश्चित हो जाओ कि एक महान आरंभ हो…
हमें यादों से इतना स्नेह होता है क्योंकि वे सार्वभौमिक हैं। उनके अन्दर 'अनन्तता' के…