सभी धर्म इस धारणा से आरम्भ होते हैं कि हमारे सीमित और मरणशील व्यक्तित्वों से महत्तर और उच्चतर कोई शक्ति या सत्ता है, उस शक्ति के प्रति पूजा का भाव और कर्म निवेदित होने चाहियें तथा उसके संकल्प, उसके विधान अथवा उसकी अपेक्षाओं का पालन किया जाना चाहिये।
लेकिन धर्म अपने प्रारम्भिक चरणों में इस प्रकार अवधारित, पूजित तथा आज्ञा-पालित शक्ति और आराधक के बीच एक अपरिमेय खाई पैदा कर देता है। योग अपनी चरमोत्कर्ष अवस्था में उस खाई को पाट देता है; क्योंकि योग संयुक्त करता है।
संदर्भ : योग समन्वय
उनके दुःख-दर्द से तीव्र रूप से पीड़ित होकर मैं तेरी ओर मुड़ी और उसका उपचार…
भागवत शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त करने तथा तुम्हारे माध्यम से बाह्य जीवन…
यह कभी न भूलो कि तुम अकेले नहीं हो । भगवान् तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारी…
जहाँ कहीं तुम एक महान अंत देखो, निश्चित हो जाओ कि एक महान आरंभ हो…
हमें यादों से इतना स्नेह होता है क्योंकि वे सार्वभौमिक हैं। उनके अन्दर 'अनन्तता' के…