सभी धर्म इस धारणा से आरम्भ होते हैं कि हमारे सीमित और मरणशील व्यक्तित्वों से महत्तर और उच्चतर कोई शक्ति या सत्ता है, उस शक्ति के प्रति पूजा का भाव और कर्म निवेदित होने चाहियें तथा उसके संकल्प, उसके विधान अथवा उसकी अपेक्षाओं का पालन किया जाना चाहिये।
लेकिन धर्म अपने प्रारम्भिक चरणों में इस प्रकार अवधारित, पूजित तथा आज्ञा-पालित शक्ति और आराधक के बीच एक अपरिमेय खाई पैदा कर देता है। योग अपनी चरमोत्कर्ष अवस्था में उस खाई को पाट देता है; क्योंकि योग संयुक्त करता है।
संदर्भ : योग समन्वय
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