श्रेणियाँ श्री माँ के वचन

प्रगति का मापदण्ड

मधुर मां, हम यह कैसे जान सकते हैं कि हम व्यक्तिगत और सामुदायिक रूप में प्रगति कर रहे हैं या नहीं?

हम प्रगति कर रहे हैं या नहीं इसका आकलन  करने की कोशिश न करना ही हमेशा वाञ्छनीय होता है क्योंकि इससे तुम्हें प्रगति करने में सहायता नहीं मिलती-बल्कि इसके विपरीत होता है। यदि प्रगति के लिए अभीप्सा सच्ची हो तो निश्चित रूप से वह परिणाम लायेगी। लेकिन तुम व्यक्तिगत या सामुदायिक रूप से चाहे जितनी प्रगति कर चुके हो, फिर भी जो प्रगति करनी बाकी है वह इतनी अधिक होती है कि राह में रुक कर, तुमने जो प्रगति की है उसका आकलन करने की कोई जरूरत नहीं।

की हुई प्रगति का बोध सहज रूप से, इस अचानक और अप्रत्याशित बोध से आना चाहिये कि तुम उसकी तुलना में क्या हो जो कुछ समय पहले थे। बस इतना ही-लेकिन इसके लिए भी तो चेतना के काफी उच्च  कोटि के विकास की जरूरत होती है।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-१)

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