श्रेणियाँ श्री माँ के वचन

प्रगति का मापदण्ड

मधुर मां, हम यह कैसे जान सकते हैं कि हम व्यक्तिगत और सामुदायिक रूप में प्रगति कर रहे हैं या नहीं?

हम प्रगति कर रहे हैं या नहीं इसका आकलन  करने की कोशिश न करना ही हमेशा वाञ्छनीय होता है क्योंकि इससे तुम्हें प्रगति करने में सहायता नहीं मिलती-बल्कि इसके विपरीत होता है। यदि प्रगति के लिए अभीप्सा सच्ची हो तो निश्चित रूप से वह परिणाम लायेगी। लेकिन तुम व्यक्तिगत या सामुदायिक रूप से चाहे जितनी प्रगति कर चुके हो, फिर भी जो प्रगति करनी बाकी है वह इतनी अधिक होती है कि राह में रुक कर, तुमने जो प्रगति की है उसका आकलन करने की कोई जरूरत नहीं।

की हुई प्रगति का बोध सहज रूप से, इस अचानक और अप्रत्याशित बोध से आना चाहिये कि तुम उसकी तुलना में क्या हो जो कुछ समय पहले थे। बस इतना ही-लेकिन इसके लिए भी तो चेतना के काफी उच्च  कोटि के विकास की जरूरत होती है।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-१)

शेयर कीजिये

नए आलेख

सच्ची वीरता

तुम पानी में गिर पड़ते हो। वह विपुल जलराशि तुम्हें भयभीत नहीं करती। तुम हाथ-पांव…

% दिन पहले

अच्छी नींद के लिए

अंदर की बेचैनी ही तुम्हें आंतरिक और बाह्य रूप से नींद लेने से रोकती है।…

% दिन पहले

भय और बीमारी

तुम्हें डरना नहीं चाहिये। तुम्हारी अधिकतर कठिनाइयां भय से आती है। वास्तव में, ९० प्रतिशत…

% दिन पहले

सच्ची करुणा

साधक को क्या होना चाहिये इसके बारे में मैं तुम्हारे भावों की कदर करती हूँ…

% दिन पहले

आशा

हमारी प्रकृति न केवल संकल्प और ज्ञान के क्षेत्र में प्रान्त है बल्कि शक्ति के…

% दिन पहले

परमात्मा हास्यप्रिय है

श्रीअरविंद ने कितनी ही बार इस बात को दोहराया है कि परमात्मा हास्यप्रिय हैं और…

% दिन पहले