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निर्जन कारावास का सुख

कम्बल, थाली-कटोरी का प्रबन्ध कर जेलर के चले जाने पर कम्बल पर बैठ मैं जेल का दृश्य देखने लगा। लालबाज़ार की हवालात की अपेक्षा यह निर्जन कारावास अधिक अच्छा लगा। वहाँ उस विशाल कमरे की निर्जनता मानों अपनी विशाल काया को विस्तारित करने का अवकाश पा निर्जनता को और भी गहन कर दे रही थी। यहाँ छोटे-से कमरे की दीवारें मानों बन्धु-रूप में पास आ, ब्रह्ममय हो, आलिंगन में भर लेने को तैयार थीं। वहाँ दो तल्ले के कमरे की ऊँची-ऊँची खिड़कियों से बाहर का आकाश
भी नहीं दीखता था, इस संसार में पेड़-पत्ते, मनुष्य, पशु-पक्षी, घर-द्वार भी कुछ है, बहुत बार उसकी कल्पना करना भी कठिन हो जाता था। यहाँ आँगन का दरवाज़ा खुला होने पर सरियों के पास बैठने से बाहर जेल की खुली जगह और कैदियों का आना-जाना देखा जा सकता है। आँगन की दीवार से सटा वृक्ष था, उसकी नयनरञ्जक नीलिमा से प्राण जुड़ा जाते। छह डिक्री के छह कमरों के सामने जो सन्तरी घूमता रहता उसका चेहरा और पदचाप बहुत बार परिचित बन्धु के चलने-फिरने की तरह प्रिय लगता। कोठरी के पार्श्ववर्ती गोहालघर के कैदी कोठरी के सामने से गौएँ चराने ले जाया करते। गौ और गोपाल थे प्रतिदिन के प्रिय दृश्य।अलीपुर के निर्जन कारावास में अपूर्व प्रेम की शिक्षा पायी। यहाँ आने से पहले मनुष्यों के साथ मेरा व्यक्तिगत प्रेम अतिशय छोटे घेरे में घिरा था और पशु-पक्षियों पर रुद्ध प्रेम-स्रोत तो बहता ही नहीं था। याद आता है, रवि बाबू की एक कविता में भैंस के प्रति एक ग्राम्य बालक का गंभीर प्रेम बहुत सुन्दर ढंग से वर्णित हुआ है, पहली बार पढ़ने पर वह ज़रा भी हृदयंगम नहीं हुई थी, भाव-वर्णन में अतिशयोक्ति और अस्वाभाविकता का दोष देखा था। अब पढ़ने पर उसे दूसरी ही दृष्टि से देखता। अलीपुर में रह कर समझ सका कि सब तरह के जीवों पर मनुष्य के प्राणों में कितना गंभीर स्नेह स्थान पा सकता है, गौ, पक्षी, चींटी तक को देख कितने तीव्र आनन्द के स्फुरण में मनुष्य का प्राण अस्थिर हो सकता है।

 

संदर्भ : कारावास की कहानी 

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