… दिव्य शक्ति न केवल प्रेरणा देती है और पथ प्रदर्शन करती है, बल्कि तुम्हारें सभी कर्मों का सूत्रपात करती और उन्हें सम्पन्न भी करती हैं; तुम्हारें सभी कर्मों का स्त्रोत वही हैं, तुम्हारी सभी शक्तियाँ उसी की हैं, तुम्हारा मन, प्राण और शरीर उसी की क्रिया के सचेतन और प्रसन्न यंत्र हैं, उसी की क्रीडा के साधन हैं, भौतिक जगत में उसी की अभिव्यक्ति के सांचें हैं।
संदर्भ : माताजी के विषय में
(अधिकतर साधक) अहंकारी होते हैं और वे अपने अहंभाव को अनुभव या स्वीकार नहीं करते।…
अवतार की सम्भावना पर विश्वास करने या न करने से प्रकट तथ्य पर कोई फ़र्क़…
यदि चैत्य पुरुष की प्रकृति जाग्रत हो जाए, अपने पीछे विद्यमान माताजी की चेतना और…
भागवत चेतना की विभिन्न अवस्थाएँ होती हैं। रूपांतर की भी विभिन्न अवस्थाएँ होती है। पहली…