चाहे तुम ध्यान लगा कर बैठो या घूमो-फिरो और काम काज करो, जिस बात की तुमसे अपेक्षा की जाती है वह है चेतना। यही एकमात्र आवश्यकता है – भगवान के बारे में सदा सचेतन रहना।
संदर्भ : पहले की बातें
भगवान के प्रति पूर्ण आत्म-दान के लिए तीन विशेष विधियाँ : (१) सारे गर्व को…
श्रीअरविन्द सूक्ष्म-भौतिक में निरन्तर रहते हैं और वहां बहुत सक्रिय हैं। मैं प्रायः रोज उनसे…
हे माँ , मैं आपकी उपस्थिति का अनुभव क्यों नहीं करता ? मानसिक गतिविधि की…